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Thursday, August 11, 2016
Friday, July 22, 2016
वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा प्रकाशित वैज्ञानिक एवं तकनीकी विषयों की शब्दावलियॉं और कोश
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Thursday, July 21, 2016
पावर पॉईंट प्रेजेंटेशन
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Wednesday, July 20, 2016
गौहत्या और किसानों की आत्महत्याऐं
आजकल
यह दोनों ही शब्दो का प्रयोग
जरा ज्यादा सुनने
में आ रहे है.
क्या
इनका आपस में कुछ संबंध हैं?
जो
समझदार है वह तो समझ गए कि
इनका क्या अंर्तसंबंध है.
हालांकि
मैंकालियन शिक्षा पद्धति
में पढें
हुए लोगो को इन दोनों शब्दों
में कोई अंर्तसंबंध न दिखाई
दें,
लेकिन
इन दोनों शब्दों का आपस
में बहुत गहरा संबंध
है.
भारतीय
दर्शनशास्त्र में गाय का
कितना महत्व है,
यह
हमारे पूर्वज तो अच्छी तरह
समझ गए थें,
लेकिन
मैकॉले महाराज हमें ऐसी पट्टी
पढा गए कि राहुल
को यह लेख लिखना पड़ा.
गाय
का कृषि में क्या महत्व
है,
यह
बताने के लिए सभी ने अपने-अपने
स्तर पर प्रयास किए।
सरकार ने कई कानून भी
बनाए,
लेकिन
बेचारी गरीब गाय अपने हत्यारों
को सजा न दे सकी.
कल
रात कपीला गाय मेरे सपने में
आयी,
मैंने
उसे पिछेसे प्रणाम करने की
कोशिश की तो गाय ने मुझे जोर
से लाथ मार दी,
मैंने
गाय से पूछा ''तुम
मुझे लाथ क्येां मार
रही हो?
मैंने
तुम्हारा क्या बिगाड़ा
है?
गाय
मुझे कहने लगी ''तुमने
मेरा कुछ नहीं बिगाडा है,
बिगाड़ा
तो लालु प्रसाद यादव ने है और
अब वह बिहार के चुनावों
में जीत गया है और मुझे डर
है कि मेरी आगे की पिढियों
को वह या तो खुद खा जाएगा या
फिर मेरे और मेरे बच्चों
के हिस्से का चारा खा जाएगा.''
मैंने
कहा ''इसमें
मैं क्या कर सकता हूँ?
न
तो मैं कोई मंत्री हूँ,
जो
गोहत्या कानून लाकर उस पर
अमल करूँ और न ही कोई प्रवचन
करने वाला बाबा हूँ.''
गाय
ने मुझे कहा ''राहुल,
तुम
बहुत अच्छे लेख लिखते हो
और भाषण भी बहुत अच्छा देते
हो.
तुम
एक काम करो!
एक
ऐसा लेख लिखों कि जिससे
भारत जैसे कृषि प्रधान देश
की अर्थव्यवस्था में मेरा
(गाय
का)
क्या
महत्व है,
यह
सबके समझ में आ जाए और मैं मेरी
भविष्य की वाली पीढीयों
के बारे में निश्चिंत
हो जाऊँ''
इसलिए
एक 'गौपुराण'
लिख
रहा हूँ.
हमारा
भारत अंग्रेजो के पहले मुगलों
का गुलाम था!
मुगलों
ने भी कभी भी गौहत्या की पैरवी
नहीं की.
टीपू
सुलतान के पिता ने तो गाय
हत्या करने वाले व्यक्ति
को फॉसी की सजा देने
का प्रावधान बनाया था,
आगे
टीपू सुलतान ने इसमें सुधार
करते हुए गौहत्या करने वाले
व्यक्ति के हाथ कॉंटने का
कानून बनाया था.
फिर
आज हमारे हिंदू लोग ही गौहत्या
की पैरवी क्यों कर रहे हैं?
भाई
राजीव दीक्षित ने तो गाय पर
पूरा रिसर्च करके बताया कि
गाय तो मरने तक गोबर और मूत्र
देती है,
जो
खेती की जमीन के लिए बहुत ही
उपयोगी होता है.
गाय
के मूत्र में मिट्टी में पाये
जाने वाले वे 33
सूक्ष्म
मूलद्रव्य प्रचूर मात्रा
में होते है,
जिनकी
आवश्यकता हमारे शरीर के लिए
होती हैं.
जिस
घर में गाय होती है,
उस
घर में हमेशा खुशहाली रहती
है.
देशी
गाय का चेहरा भी हसमुँख होता
है.
गाय
के कंधे में सूर्यकेतु
नाडी होती हैं,
जो
सीधे सूर्य से उर्जा ग्रहण
करती है,
गाय
के दूध में कैसर जैसे रोगों
से लड़ने की ताकत होती है.
गाय
का दूध बुद्धीवर्धक होता है,
जबकि
भैस का दुध शक्तिवर्धक होता
है.
गाय
के गोबर में और मूत्र में जमीन
की उर्वरकता बढाने की शक्ति
होती है.
इन
सभी गुणों को समझने के कारण
ही हमारे पूर्वजों ने गाय को
माता का दर्जा दिया.
लेकिन
आज के मैकाले के मानस पूत्रों
ने गाय के इस वैज्ञानिक अर्थ
को नही समझा.
बल्कि
जिनके द्वारा यह महत्व समझा
जाना आवश्यक था,
उन्होंने
ही विवाद बढा दिया.
कोर्इ
कहता है,
''गाय
हमारी माता हैं!''
इस
पर मार्कडेय काटजू जैसे
विद्वान कहते हैं कि ''गाय
सिर्फ एक प्राणी है'',
लेकिन
कोई भी गाय के वैज्ञानिक और
अर्थशास्त्रीय महत्व को
नहीं जानना चाहता है.
''गाय
हमारी मॉं है,
बैल
हमारा मामा है,
घोडा
हमारा चाचा है और बकरी हमारी
बहन है'',
यह
सब कहने से पहले यदि गाय के
अर्थशास्त्र को समझते तो,
यह
विवाद नहीं होता.
भारत
एक कृषिप्रधान देश है,
जिसमें
प्राचीन काल से ही खेती व्यवसाय
किया जा रहा हैं और खेती से
जुड़े हुए व्यवसायों के कारण
ही भारत के व्यवसायों की
बढौतरी हो रही थी.
इसीलिए
गाय को धर्म के साथ जोड़ा गया
और लोगों को यह बताया गया कि
गाय में 33
कोटी
देवता होते हैं,
इसलिए
लोग गाय की हत्या करने से
डरते थे,
क्योंकि
पाप-पुण्य
के डर से लोगों के आचरण को
नियंत्रित किया जा सकता
था.
पाप-पूण्य
की अवधारणा ही कानून के प्रावधानों
का काम करते थें.
लेकिन
आज के वैज्ञानिक युग में
पाप-पुण्य
की अवधारणा नष्ट
होती जा रही है.
लोग
प्रत्येक कार्य के पीछे के
कार्य-कारण
संबंध को समझकर वैज्ञानिक
दृष्टिकोण देखते
है और अपने विचार
बनाते हैं और विज्ञान के
आधार पर कंस कर देखते हैं कि
क्रिया और कार्य का वैज्ञानिक
संबंध क्या है.
आज
के भौतिकवादी युग में भावना
के स्थान पर लोग फायदे-नुकसान
का अर्थशास्त्र देखते हैं,
जिसमें
उन्हें फायदा दिखाई देता
हैं उसमें उन्हें अधिक रूची
होती है.
पाप-पुण्य
और लोक-परलोक
की बातें विज्ञानवादी नहीं
मानते है.
लेकिन
इन अवधारणाओं की वैज्ञानिकता
और वास्तविकता को हमें समझना
होगा.
पहले
किसी को आप बताते कि अमूक
काम करने से पाप लगता है,
तो
लोग उसे कानून समझकर मान लेते
थे लेकिन आज ऐसा नहीं होता
है,
इसीलिए
लोग जानबूझकर वही काम करने
से नहीं डरते हैं जिन कार्यों
को धर्मशास्त्र में करने
के लिए मना किया गया है,
गलती
उनकी भी नहीं है।
उन्हें आप स्कूल-कॉलेजों
में जो पढाओंगे उसी को तो वह
मानेंगे.
स्कूल-कॉलेजों
में पढाया जाता हैं कि लोक-परलोक
कुछ नहीं है,
सब
मनगढंत है,
इनपर
विश्वास मत करों.
गाय
तो एक प्राणी है,
उसमें
33
कोटी
(गलती
से 33
करोड़
मान लिया)
भगवान
कैसे हो सकते है.
यह
अंधश्रद्धा है,
विज्ञानवादी
दृष्टीकोण अपनाइऐं,
इत्यादि।
लेकिन यह सब सिखाते समय
पढाने वाले इस बात को भूल जाते
हैं कि उपरोक्त कही गई बातों
में भी विज्ञान ही था.
लेकिन
वह विज्ञान उस समय के अनुकूल
था.
आज
के विज्ञान की दौड़
ने हमें पर्यावरण से दूर कर
दिया.
जो
लोग स्कूलों-कॉलेजों
में विज्ञान के पाठ पढ़ाते
हैं,
उन्हें
भारत में अंग्रेज आने के पहले
भी कोई विज्ञान था या
नहीं,
जिसे
हम धर्मशास्त्र के रूप में
ही जानते थें यह पता नहीं है.
हमारा
पूरा धर्मशास्त्र और
दर्शनशास्त्र सीधे प्रकृति
से जुड़ा हुआ है.
सभी
उत्सव-त्यौहार
सीधे प्रकृती के परिवर्तनों
के अनुसार आचरण करने का संदेश
देते है.
सभी
पशू,
पक्षी,
जीव-जंतूओं
के संरक्षण का संदेश हमारी
संस्कृति देती है। ज्ञान,
विज्ञान,
तकनीक,
प्रौद्योगिकि
का सीधा संबंध प्रकृति से
है और उसे धर्मशास्त्र के
माध्यम से संचालित किया
जाता था.
धर्मशास्त्र
ही उस समय का कानून था,
जिससे
समाज को नियंत्रित रखा जाता
था.
खैर,
हमारी
गाय हमारी प्रतिक्षा कर रही
है.
गाय
में 33
कोटी
देवता होते है.
इसका
वैज्ञानिक अर्थ यह हैं कि
गाय में 33
प्रकार
के देवता होते हैं,
कोटी
से यहा प्रकार(टाईप)
अर्थ
है.
अब
यह 33
कोटी
देवता ही वह 33
प्रकार
के तत्व हैं,
जिन्हें
आज हम माइक्रोन्यूट्रीऐंन्टस्
के रूप में जानते हैं.
जो
मिट्टी की उर्वरकता के लिए
आवश्यक होते हैं,
जो
गाय के मूत्र और गोबर में पाए
जाते हैं.
गाय
के गोबर और मूत्र के आयुर्वेदिक
और वैज्ञानिक महत्व के कारण
ही गाय का दर्शन आगे से अर्थात
मुख से नहीं बल्कि उसके पीछे
से दर्शन करने शुरूआत हमारे
पूर्वजों ने की थी.
बाद
में अंग्रेजों ने देखा कि
इस देश की कृषिव्यवस्था
बहुत ही समृद्ध है और गाय इस
कृषिव्यवस्था के रीढ़ की
हड्डी हैं,
और
पशुपालन व्यवसाय इसका सहायक
व्यवसाय हैं। उन्होंने
उस पर प्रहार करना शुरू किया.
पहले
तो उन्होंने हिंदू धर्म में
पवित्र मानी जाने वाली गायों
को मुस्लिमों द्वारा कटवाने
के लिए हमारे देश में कत्तलखाने
शुरू किए,
जिसमें
जानबूझकर मुस्लिमों को गाय
काटने काम दिया,
ताकि
भारतीय गाय कॉटने का दोष
अंग्रेजों को नहीं बल्कि
मुस्लिमों के सीर मढा
जा सकें,
ताकि
देश की धार्मिक एकात्मता
पर प्रहार करते हुए यहां कि
सामाजिक व्यवस्था में
दरारे डाली जा सकें और देश
की आंतरिक एकात्मता को चोट
पहुँचाकर हम भारतीय आपस में
ही मर-मीट
जाए ऐसी व्यवस्था की और
अंग्रेजों को देश पर राज करने
का मौका मिल सकें.
''तोड़ो
और राज करों''
यही
नीति अपना कर अंग्रेजों में
सदीयों तक हम पर राज किया.
बाद
में जब अंग्रेजों जब ऐसा लगा
कि अंग्रेजों के जाने बाद
यह देश पून्ह:
एक
हो सकता है,
इसीलिए
पाकिस्तान जैसे धर्माधारित
राष्ट्र का निर्माण करने
के षडयंत्र के साथ उन्होंने
देश छोड़ा.
भारत
से अंग्रेजों के वापस लौटकर
जाने के पहले उन्होंने देश
की सामाजिक व्यवस्था में
ऐसे परिवर्तन करवाए जिससे
हम आजादी के बाद आपस में ही
मर-मीट
जाने को तैयार हो जाए,
इसलिए
अंग्रेजों ने एक अपने देश से
एक ऐसे विद्वानों को बुलाया
जो देश की शिक्षा व्यवस्था
में आवश्यक परिवर्तन कर
सकें जो अंग्रेजों की व्यवस्था
को और मजबुत बना सकें.
इसीलिए
मैंकाले के उस भाषण पर ध्यान
देना आवश्यक हैं,
जिसमें
उन्होंने ब्रिटीश पार्लमेंट
में कहा था कि,
भारत
की शिक्षा व्यवस्था ही इस
देश की रीढ़ की हड्डी है,
यदि
हम यह चाहते हैं कि हम भारत
पर राज करें तो इस देश की शिक्षा
व्यवस्था में ऐसे परिवर्तन
करने होगे जो देश की सामाजिक,
आर्थिक
और राजनीतिक व्यवस्था इस
प्रकार से परिवर्तित किया
जा सकें कि भारतीय केवल शरीर
से भारतीय रहें और विचारों
से पूरी तरह अंग्रेज हो जाए.
इसीलिए
उन्होंने हमारे देश की शिक्षा
व्यवस्था में विज्ञान के
नाम पर ऐसे विषयों का समावेश
करना शुरू किया जो हमारे देश
व्यवस्था के बिलकूल प्रतिकूल
थें.
जिसमें
यह बताना कि विज्ञान का उगम
केवल उनके द्वारा अर्थात
पश्चिम में होना और भारत
में अंग्रेजों के आने के पहले
किसी भी प्रकार की वैज्ञानिक
सोच का न होना,
ऐसी
बातों को प्रसारित किया
गया और विज्ञान के नाम पर
अपने राष्ट्र-विघातक
विचारों को देश में प्रचारित
किया था.
गाय
का और देश की अर्थव्यवस्था
से सीधा संबंध है.
हम
विज्ञान में जितनी चाहे
प्रगति कर ले आसमान में अनाज
नहीं उगा सकते,
उसके
लिए जमीन पर ही आना पड़ेगा.
विज्ञान
के प्रयोगों से हमने धुऑ छोड़ने
वाले वाहन बनाए।
लेकिन पेड़ों में ही वह ताकत
है जो आपके बनाए
कार्बनडाय ऑक्साइड को अपने
अंदर समा सकें और आपको शुद्ध
ऑक्सीजन दे सकें.
जमीन
को जहरिले बनाने वाले खादों
के प्रभाव को निष्क्रीय
करने की शक्ति केवल गाय के
मूत्र में ही है.
गाय
का गोबर और मूत्र ही खेती की
जमीन का अमृत है.
आज
जो किसान आत्महत्या करने
के लिए मजबूर है,
उसका
सीधा सा संबंध गौहत्या और
गोवंश का विनाश है.
गाय
जो स्वयं घॉस-फॅूस
खाकर आपको खेती के लिए गोबर,
मूत्र
और दूध देती है। एक गाय
को काटने से 80
मांसाहारी
लोगों को ही भोजन मिल सकता
है,
जबकि
एक गाय को पालने से 18से
20
साल
की आयु में आपके पास 10
जोडी
बैंल एकत्रित हो जाऐंगे जिन
से आसानी से खेती की जा सकती
है। भारत में अधिकतर किसानों
के पास 10
एकड़
से कम खेती हैं,
उन्हें
बैल सहायक होते है। उसे
केवल मॉंस के लिए एक दिन में
मार डालना और गोमाँस खाने की
पैरवी करना,
एक
बहुत बड़ी महामुर्खता है.
केवल
यह समझना कि ऐसा करने से किसी
वर्ग विशेष के लोगों के
वोट बटोरे जा सकते हैं,
यह
सोच ही देश के किसानों की
आत्महत्या का अप्रत्यक्ष
कारण है.
गाय
सीर्फ पंचगव्य ही नहीं देती
है,
बल्कि
इससे प्राप्त होने वाले बैंल
भी ट्रैक्टर का खर्च बचाते
है.
ट्रैक्टर
से खेती का काम जल्दी हो जाता
है,
लेकिन
आपका ट्रैक्टर गोबर और मूत्र
नहीं देगा जो खेती के लिए
आवश्यक है.
आप
अपने ट्रैक्टर का उपयोग माल
की ढुलाई करने के लिए निश्चित
कर सकते हैं,
लेकिन
जब आप लाखों के टैंक्टर से
यह अपेक्षा मत किजिए कि
आपका ट्रैक्टर खेती की उर्वरकता
बढाने में कोई योगदान नहीं
दे सकता.
गाय
अकाल के समय में उपयोग में आने
वाला प्राणी है,
जो
आपको भुखा मरने से बचाता है,
घर
में अनाज न होने पर दुध से पेड़
भरकर गुजारा तो कर ही सकते है.
इसके
अतिरिक्त गोबर गैस के
निर्माण से रसोई गैस भी चलाया
जा सकता है। पंचगव्य और औषधीयों
के लाभ भी प्राप्त किए जा
सकते हैं।
हमारे
धर्मशास्त्रों में प्रत्येक
देवी-देवता
और अवतारों का कोई वाहन अवश्य
होता है.
यह
वाहन उनकी शक्ति को दर्शाता
न कि उनपर बैठने का साधन.
श्रीकृष्ण
और दत्तात्रेय का वाहन गाय
है,
इसका
क्या अर्थ है?
क्या
आपने यह अर्थ निकाला कि
श्रीकृष्ण गाय पर बैठते थें?
क्या
आपने कभी श्रीकृष्ण की गाय
के उपर बैठी तस्वीर देखी?
नहीं.
वे
तो रथ पर बैठते थें?
जिन्हें
घोड़े खिंचते थें.
गाय
का पालन तो वे गाय से प्राप्त
करने वाले दुध और गोमुत्र तथा
गोघृत के लिए किया करते थें.
बलराम
ने अपने कंधों पर हल लिया
किसलिए?
क्या
अपने शत्रुओं को मारने के
लिए,
नहीं
उनके पास इससे भी अच्छे शस्त्र
थें.
कौन
मुर्ख व्यक्ति इतने बड़े
हल को अपने शत्रुओं मारेगा?
उन्होने
जो हल अपने कंधों पर उठाया था
वह कृषि करने के लिए न कि
शत्रु को मारने के लिए.
क्योकि
श्रीकृष्ण का समय आज से लगभग
5100
वर्षों
पहले का है,
जिसमें
भारत कृषिव्यवस्था अपने
चरमोत्कर्ष पर थी.
दत्तात्रेय
को क्या गाय ही वाहन के रूप
में मिली?
नहीं,
वह
तो आपको गाय पालने का संदेश
दे रहे है,
उनके
चित्र के पास के कुत्ते भी
उनका वाहन नहीं है,
कुत्ते
तो मनुष्य के विकास की यात्रा
के रखवाले है,
जिन्होंने
खेतों में आनेवाले हिंसक
जानवरों से हमें आगाह करने
का काम किया,
इसलिए
हमने उन्हें दत्तात्रेय के
पैरों के पास स्थान दिया.
गाय
को माता क्यों कहते हैं यह
जानने के लिए गाय के धर्मशास्त्र,
अर्थशास्त्र,
समाजशास्त्र
और दर्शनशास्त्र को समझना
होगा.
नहीं
तो वहीं गाय हमारे किसानों
की आत्महत्या का कारण बन
जाऐगी,
क्योंकि
धर्मशास्त्र यह भी कहता है
कि आप जैसा कर्म करते है,
वैसा
ही फल प्राप्त होता
है.
यदि
किसान अपनी गायेां
को कसाई को बेंचेंगे तो किसान
किसान को भी कर्ज के बोझ से
एक दिन फॉंसी चढना पड़ेगा
क्योंकि ''जो
बोएगा सो पाऐगा,
यही
है गीता का ज्ञान’’
Saturday, April 30, 2016
दशावतारों की वैज्ञानिकता
राहुल
खटे,
उप
प्रबंधक (राजभाषा),
स्टेट
बैंक ऑफ मैसूर,
हुबली
(कर्नाटक)
मोबाइल
नं.
(09483081656)
हमारे
18 पुराणों
में दशावतारों की कथा आती है।
लेकिन पढे-लिखे
लोग इसे काल्पनिक
मानते हैं। इसमें उनकी कोई
गलती नहीं हैं,
क्योंकि
जो लोग इन दस अवतारों महिमा
मंडन करते है,
तब यह नहीं
बताते कि यह दस अवतार कब हुए
और इसका वैज्ञानिक
आधार क्या
हैं।
आइए,
इसे वैज्ञानिक
दृष्टि से
समझने का प्रयास करते है। इसके
लिए हमें
पुराणों के साथ-साथ
आधुनिक जीव
विज्ञान और भूगोल
का भी सहारा लेना होगा।
विष्णु
पुराण एवं अन्य
पुराणों के अनुसार सबसे पहला
अवतार है मत्स्य
अवतार। अब
देखते है कि आधुनिक
जीवविज्ञान
और भूगोल का
अध्ययन क्या
कहता है इसके बारे में।
भूगोल/जीवविज्ञान
के अनुसार पृथ्वी सूर्य से
आज से लाखों
वर्षों पहले अलग
हुई। प्रारंभ में यह पृथ्वी
सूर्य के समान आग का एक गोला
ही थी। धिरे-धिरे
यह ठंडी होनी शुरू हुई और आज
से तकरिबन 2
अरब वर्षों
पहले पृथ्वी
पर जल की उत्पत्ति
हुई। वैज्ञानिक
दृष्टि से आग
से ही पानी की उत्पन्न
होता है। पृथ्वी
पर पानी जबसे
बना जीवन जीने वाले जीव ही
उत्पन्न हुए
होगे अर्थात मछली आदि
जीव। सबसे पहला अवतार जो है
वह है -
मत्स्य
अवतार अर्थात
सबसे पहले मछली आदी जीवों की
उत्पत्ति
की बात पूर्णत:
वैज्ञानिक
धरातल पर सही बैठती है अर्थात
इसमें कोई भी अवैज्ञानिकता
नहीं है।
दूसरा
अवतार है-
कच्छ
अवतार। जैसे-जैसे
पृथ्वी पर
पानी की मात्रा कम होने लगी
और उसमें से जमीन भी अलग होने
लगी तो ऐसे जीवों की उत्पत्ति
हुई होगी जो जल और जमीन दोनों
पर जीवन जीने की क्षमता वाले
जीव/प्राणी
थे। कछुआ एक
ऐसा प्राणी है जो उभयचर
हैं। उभयचर अर्थात वे जीव जो
जल और जमीन दोनों पर जीवन जीने
की क्षमता रखते हों। कछुआ जल
और जमीन दोनों पर जीवन जीने
की क्षमता रखते हैं। इसलिए
दूसरा अवतार कच्छ
अवतार पूरी तरह से वैज्ञानिक
धरातल पर सही साबित
होती है।
तीसरा
अवतार है-
वराह
अवतार। जैसे-जैसे
पानी और जमीन अलग होने लगे
वैसे जीवसृष्टी का भी विकास
होने लगा और विशेष
क्षमता के जीव जो केवल जमीन
पर जीवन जी सकते थे,
उनकी उत्पत्ति
होने लगी। जैसे की वराह
अर्थात-
सूअर
प्रजाति के प्राणी। सूअर
पूर्ण रूप से जमीन पर जीवन
व्यतीत कर
सकते हैं। इसलिए
यह अवतार भी वैज्ञानिक
दृष्टि से सही
है और आगे जीवों के विकास
की यात्रा भी जारी रही।
चौथा
अवतार है-
नृसिंह
भगवान का । जो पशु(सिंह)
और इन्सान
का मिश्रण है।
भूगोल के अनुसार एक समय ऐसा
था जब केवल मानव-सदृश
प्राणी और प्राणी-सदृश
मानव हुआ करते थे।
नृसिंह भी इसी श्रेणी के अवतार
थे जो मानव के विकास
यात्रा का महत्वपूर्ण
पडाव थे। जब
प्राणियों
से मानव बनने की विकास
यात्रा का सफर तय कर रहें थे।
तो यह अवतार भी बिलकुल
सही है और वैज्ञानिक
धरातल पर पूरी तरह से सही बैठता
है।
पाँचवाँ
अवतार हैं-
बटु
वामन का। इन्सान
का जब जन्म
होता है तो वह बच्चा
होता है बाद में धीरे-धीरे
बढ़ते हुए छोटा
बालक बनता है। उसका कद छोटा
होता है अर्थात वह बडों की
तुलना में बटु
(छोटा)
ही होता
है। बटु वामन ने दान में बली
से सब कुछ दान में ले लिया
था ताकि उसका अभिमान
नष्ट हो । बाद
में उसके विकास
की यात्रा भी जारी रही।
छठवां
अवतार है-
परशुराम
का। भारत में एक समय ऐसा था जब
सभी लोग आपस में केवल लड़ने-
भीड़ने का
ही काम करते रहते थे
जैसे कि अन्य
पशु। इसलिए
परशुराम का स्वभाव
भी हथियारों
से लैस और आक्रामकता से परिपूर्ण
हैं,
जिसने
कितनी ही बार
पृथ्वी को
नि:क्षत्रीय
किया था। यह
आक्रामकता एवं मार-
काट मनुष्य
जीवन के विकास
का अभिन्न अंग
रही है। तो यह अवतार भी वैज्ञानिक
दृष्टि से
बिलकुल सही
लगता हैं। आगे विकास
होता गया।
सातवां
अवतार हैं-
दशरथ
पुत्र श्रीराम
का। राम को मानवीय इतिहास
एक महत्वपूर्ण
पडाव माना
जाता है,
क्योंकि
राम ने बहुत से नीति मूल्यों
की स्थापना
में मानवता अपना योगदान दिया
है। आज तो रामसेतु और अन्य
हजारों प्रमाणों से यह सिद्ध
भी हो रहा है कि राम भारत में
आज से लगभग
9100 वर्षों
पूर्व हो चुके है। अर्थात इसा
पूर्व 7100
वर्ष पूर्व।
जिसके लाखों
प्रमाण भी है। राम ने मानव
जीवन के विकास
के क्रम को और भी गति दी न केवल
भौतिकता से
उपर उठकर जीना सिखाया
बल्कि मानवीय
मूल्यों की
स्थापना करते
हुए मानव के जीवन विकास
को गति दी। जो
पूर्णत:
वैज्ञानिक
धरातल पर सत्य
प्रतीत हो रहा है।
आठवाँ
श्रीकृष्ण
का। श्री कृष्ण आज से लगभग
5200 वर्षों
पूर्व हुआ,
जिन्होंने
मानवीय मूल्यों
की स्थापना
के साथ-साथ
राजनीतिक
दांवपेचों
और नैतिकता
की शिक्षा दी
और दोनों की बीच तालमेल बिठाया।।
जिनकी द्वारका
आज भी गुजरात (कच्छ)
के पास के
समुद्र में है। जो मानवीय
इतिहास का एक महत्वपूर्ण
पडाव है,
जो विकासवाद
की भी पुष्टि
करता हैं।
नौवाँ
अवतार है-
भगवान गौतम
बुद्ध का।
भगवान गौतम बुद्ध ने अहिंसा
के माध्यम से
संपूर्ण विश्व
को शांति का संदेश दिया।
विकासवाद में एक और महत्वपूर्ण
पडाव है भगवान गौतम बुद्ध।
यह वैचारिक
विकास केवल
भौतिकता के
क्षेत्र में नहीं मानवता के
इतिहास में
भी मायने रखता है।
दसवां
अवतार है -
कल्की
अवतार। यह विकासयात्रा के
अंतिम पडाव
का अवतार है। जो समस्त
मानव जीवन को एक-साथ
लाएगा और संपूर्ण मानव जाति
के लिए कार्य
करेगा और विकास
की यात्रा को पूर्ण विराम
लगाएगा। मनुष्य
को उनके जीवन का
वास्तविक
उदयेश्य से परिचय
करवाएगा।
डार्विन
के विकासवाद
को ठीक से पढे,
तो उसमें
बंदरों से मानव के विकास
की जो बात कही है वह कुछ हद तक
ठीक है क्योंकि
बंदर और और मनुष्य
में काफी साम्यताएं दिखाई
देती है। यदि हम यह माने कि
मनुष्य के
जन्म से ठीक
पहले का यदि कोई जन्म
होगा तो वह बंदर का ही हो सकता
है। बंदरों की शारीरिक
रचना और मनुष्य
की शारीरिक
रचना में काफी साम्यता
पायी जाती है। बौद्धिक
विकास और
शारीरिक रचना
का थोड़ा विकास
हो तो बंदर के बाद मनुष्य
का शरीर उसके
लिए उचित
लगता हैं।
मनुष्य के
शरीर की रीढ़
की हड्डी में अभी भी वह निशान
मिलता है जहां
बंदरों को पूंछ होती है। विकास
की इस यात्रा में मनुष्य
से पूंछ पीछे
छुंट गई।
पुराणों
के अनुसार 84
लाख योनियों
के बाद मनुष्य का जीवन प्राप्त
होता हैं इसको वैज्ञानिक
दृष्टि से
जांच कर देखें तो इसमें 21
लक्ष जारज,
21 लक्ष अंडज,
21 लक्ष उद्भीज
और 21 लक्ष
जलज जीव है,
जिसे
'योनियां'
कहा गया
है। यदि धरती पर जीवशास्त्र
की दृष्टि से
देखें तो पायेंगे कि यह सभी
प्रजातियां आज भी उपलब्ध
है। कुछ की संख्याओं
में कमी आयी होगी। लेकिन
उनके जीवाश्म
अभी भी जल और मिट्टी
में मौजूद हैं। मनुष्य प्राणी
मां के पेट में जितने
दिन रहता है,
उसे यदि
सेकंदों में विभाजित
किया गया,
तो वह लगभग
84,00,000 ही
आता है। यदि
हम यह माने की प्रकृति हमें
सभी फल,
फूल
और अन्य जीवों
की सेवा इसलिए
मिल रही है,
क्योंकि
हम भी कभी यह सब कुछ रह चुके
हो, तभी
तो हमें यह सब कुछ प्रकृति
ने देखने का मौका दिया
है।
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